शक्ति संकेत

दस वर्षों बाद डॉ. सक्सेना इस शहर में लौटे थे। यह शहर उनका पुराना कार्यक्षेत्र था। अध्ययन के कुछ वर्ष, अध्यापन के कुछ वर्ष और शोध के कुछ वर्ष—सही कहा जाए तो डॉ. सक्सेना इस शहर की यादों से मुक्ति नहीं पा सकेंगे। दस वर्षों तक अज्ञात रूप से देहात के अपने पुराने बंगले में शोध, परीक्षण और अध्ययन को दे चुकने के बाद कुछ दिनों तक घूमने के ख्याल से वे शहर आए थे।

डॉ. सक्सेना ने अपने मित्र प्रोफेसर चक्रवर्ती के मकान में लगी घंटी का बटन दबाया।

“किससे मिलना चाहते हैं? दरवाज़ा खोलने वाले युवक ने पूछा।”

“प्रोफ़ेसर चक्रवर्ती से कहो—डॉ. आर.एल. सक्सेना मिलना चाहते हैं।”

युवक चौका—”सक्सेना अंकल! अंकल, अंदर आइए न! मैं विनय हूँ, प्रोफ़ेसर चक्रवर्ती का बड़ा लड़का।”

“——– ओ हो! तुम… बड़े लंबे-चौड़े हो गए हो, भाई! मैं तो पहचान ही नहीं सका,” डॉ. सक्सेना आश्चर्य मिश्रित स्वर में बोल रहे थे— “दुनिया दस वर्षों से बहुत तेज़ी से बदली है, लेकिन तुम और ज़्यादा तेज़ी से बदले हो—-।”

घर में प्रोफ़ेसर चक्रवर्ती, उनकी पत्नी, उनके दोनों बेटे, सभी
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रोबोट और आँसू

न्यूयार्क की अन्तर्राष्ट्रीय रोबोट प्रदर्शनी में युवा इंजीनियर और प्रतिभाशाली वैज्ञानिक आनन्दवर्द्धन द्वारा निर्मित, रोबोट ‘जिन्दादिल-1’ को उसकी विचित्रताओं के कारण विशिष्ट पुरस्कार मिला इस रोबोट की यह विशेषता थी कि वह सिर्फ सुखद और खुशहाल वातावरण में कार्य करता था आंसुओं, चीखों और चिल्लाहटों से जिन्दादिल 1 को एलर्जी थी ठहाकों से उसकी बैटरी चार्ज होने लगती थी और रोने और कराहने की आवाजों से उसकी बैटरियाँ अपनी शक्ति खो बैठती थीं

न्यूयार्क में ही जिन्दादिल-1 की कार्य प्रणाली का परीक्षण भी किया गया एक विशाल पार्टी में जिन्दादिल-1 ने सैकड़ों आदमियों को पानी और कोकाकोला पिलाया दूसरे दिन इस रोबोट को एक अस्पताल में कार्य करने को कहा गया संयोगवश उसी दिन वहाँ एक वायुयान दुर्घटना में आहत व्यक्तियों को लाया गया था चीखने और कराहने की आवाजें इमरजेन्सी वार्ड में फैली हुई थी जिन्दादिल-1 की शक्तियाँ मानो तीव्र गति से लोप हो गयीं और वह दिनभर सीढियों के पास बैठा रह गया

डॉ. वर्द्धन को काफी देर तक उसकी खोपड़ी में लगे यंत्रों, सिफैलिक डिस्कों और बैटरियों से जूझना पड़ा तब जाकर जिन्दादिल-1 उठने के काबिल हो सका । आदमी की भाँति कुछ संवेदनाओं का समावेश इस आधुनिकतम प्रणाली से निर्मित यंत्र मानव में करके डॉ. वर्द्धन ने रोबोटों की दुनिया को आदमियों की दुनिया के काफी निकट लाने का यत्न किया है

वैसे अपने रोबोट ‘जिन्दादिल-1’ के संबंध में डॉ. वर्द्धन के सपने, विश्वास और तर्क अलग किस्म के ही हैं । ‘जिन्दादिल-1’ की परिचय पुस्तिका में डॉ. आनन्दवर्द्धन ने लिखा है-“मेरी महत्वाकांक्षी निर्मित अत्याधुनिक रोबोट ‘जिन्दादिल-1’ भी अन्य सभी रोबोटों की भांति ऑसिमोव द्वारा स्थापित
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टी.एस.ए., ई. रामास्वामी और वे अजनबी लोग

प्रसिद्ध वैज्ञानिक ई. रामास्वामी के निधन के कुछ दिन बाद इस अजीबोगरीब विवरण को पढ़कर आप चौकेंगे। लेकिन यह डॉ. ई. रामास्वामी की इच्छानुसार ही हो रहा है। उनकी प्रसिद्ध खोज टी.एस.ए. अर्थात् टेलीसेन्सिटिव एप्रोच से संबंधित पुस्तक भी प्रेस में है और इस कथा के संबंध में उस किताब की भूमिका में भी आपको कई संकेत मिलेंगे।

यह कथा आपको एक जासूसी कथा कोरा साईटिपिफक्शन या एक अविश्वसनीय विवरण जो भी लगे इसकी सच्चाई के संबंध में मैं एक बात बता दूँ कि तीनों चीजें जिनका विवरण आप इस कथा में पायेंगे आज भी कोयम्बटूर के एसटीएम भवन (सायंस एंड टेक्नालॉजी म्यूजियम भवन) के एक शीशे के चैम्बर में सुरक्षित रखी हुई है, इसे आप जब चाहे म्यूजियम के क्यूरेटर महोदय से सम्पर्क कर देख सकते हैं। इन चीजों की आधिकारिक जाँच राष्ट्रीय विज्ञान प्रयोगशालाओं में कई बार की जा चुकी है और अब तक के निष्कर्ष तो यही निकले है कि इनका निर्माण पृथ्वी पर नहीं हुआ है। डॉ. रामास्वामी का कहना था कि युवा वैज्ञानिक सीधे तौर पर उनके मुक्ति प्रसंग की कथा पर विश्वास न कर एसटीएम भवन में रखी चीजों को आधर अपनी खोज जारी रखें।

 वर्ष 1980 का अक्टूबर का महीना था। दूर संचार तकनीक के कुछ अभिनव सिद्धांतों की खोज कर इस क्षेत्र में क्रांति लाने वाले विश्व प्रसिद्ध भारतीय वैज्ञानिक डॉ. ई. रामास्वामी फ्रेडरिक-फैराडे फाउन्डेशन का पुरस्कार प्राप्त करने अमेरिका गए थे।

 कई साक्षात्कारों और आयोजन समिति के समारोहों से मुक्ति पाने के बाद डॉ. स्वामी ने हिन्दू मन्दिर के भारतीय पुजारी आचार्य हरिसेन से मिलने की इच्छा जतायी। उनका सिराक्यूज जाने का प्रबंध किया गया। सिराक्यूज स्थित हिन्दू मन्दिर के पुजारी आचार्य हरिसेन की कथा भी रोचक है। कभी डॉ. रामास्वामी और हरिसेन विश्वविद्यालय में साथ साथ पढ़ते थे।
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सोलोग्राम, सोलट्रेशन और रिग्रेशन थिरेपी

फ्लाइट डेढ़ घंटे लेट थी। मैं डॉ. अनिमेष बोस के विशेष आग्रह एवं आमंत्रण पर एरिजोना जा रहा था । एयरपोर्ट के वेटिंग लाउंज में बैठा हुआ मैं सोच रहा था कि डॉ. बोस ने अपनी टीम के साथ लगातार शोधरत् रहकर मिथकीय धरणाओं को कितना बड़ा वैज्ञानिक आधर सौंप डाला है । यह जब पूरे विश्व को पता चलेगा तो संभवतः पूरा विश्व चौंक उठेगा । एकबारगी किसी को विश्वास नहीं होगा कि ऐसा भी किया जा सकता है ।

पहले डॉ. बोस के बारे में थोडा आप भी जान लें तब मैं बताऊंगा कि कुछ दिनों में मैं किस बड़े प्रयोग का साक्षी बनने जा रहा हूँ । इंडियन इन्स्टीट्यूट ऑफ एडवांस्ड साइन्टिफिक रिसर्च के पूर्व निदेशक डॉ. ए. बोस विश्व के एक बड़े वैज्ञानिक ही नहीं बल्कि भारतीय परम्परा के एक अच्छे विचारक, पौराणिक मिथकों के विश्लेषणकर्त्ता तथा उच्च कोटि के साधु माने जाते हैं । उन्होंने विज्ञान कांग्रेसों की अध्यक्षता ही नहीं बल्कि भगवतकथाओं की बड़ी गोष्ठियों का मंच संचालन भी किया है । जब कभी वे जन्म, मृत्यु, पुनर्जन्म, आत्मा, परमात्मा पर बोल रहे होते हैं तो लगता रहता है कि कोई वैज्ञानिक नहीं बल्कि पौराणिक कथावाचक प्रवचन कर रहा है या कोई दार्शनिक तथ्यान्वेषी आपसे मुखातिब है ।

डॉ. बोस के भारत छोड़ने की घटना भी विचित्र है । इस वैज्ञानिक साधु के साथ एक साधरण सी घटना घटी और लगा कि इस व्यक्ति का दिमाग फिर गया है । उन्होंने न कोई करण बताया, न किसी से कुछ कहा, केवल कुछ दिन मौन रहकर इंस्टीट्यूट छोड़ दिया और कालांतर में अपने तीन शिष्यों, जो युवा प्रतिभाशाली वैज्ञानिक थे, को साथ लेकर एरिजोना स्टेट के सान कार्लोस शहर में रहने लगे । सामान्य लोगों ने तो यह कहकर छुट्टी पाली कि चलो एक पागल वैज्ञानिक को तीन
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जिब्रॉक्स का प्रेत

एक साथ दो देशों में कुछ समय पूर्व एक ही रोमांचकारी घटनाएँ घटी। घटनाएँ आपको याद होगी लेकिन जिस प्रकार इनका रहस्योद्घाटन हुआ है और एक बड़ी संभावित विपत्ति से मानव समुदाय बचा है, वह आपको पता नहीं होगा। अभी यह पूरी कथा अखबारों में भी नहीं आ पायी है लेकिन शीघ्र आ जायेगी। संक्षेप में मैं जो भी बताने जा रहा हूँ उससे आपकी जिज्ञासा की तुष्टि हो जाएगी।

पहले एक दृष्टि डाले अखबार की उस कटिंग पर जिसमें पहले दिन वह विस्मयकारी खबर छपी थी और जिसके बाद कई दिन तक अखबारों में वह सर्वाधिक पढ़ी जाने वाली रोचक रोमांचक खबर के रूप में बनी रही।

न्यू इंडिया टाइम्स मानपुर, 12 दिसम्बर।

भयंकर पक्षी के कारण हेलिकॉप्टर दुर्घटनाग्रस्त होने से बाल-बाल बचा शूटिंग कार्यक्रम रद्द। भयभीत कलाकार वापस ।

कल सायंकाल ऐलिफैन्टा आर्ट्स की एक फिल्म की शूटिंग के लिए जा रहे कलाकारों की टीम विंध्य की तराई में उतरने ही वाली थी कि उनका हेलिकॉप्टर टी. 2540 एक भयानक चार फीट के दैत्याकार पक्षी से टकराते टकराते बचा और चालक की कुशलता के कारण हेलिकॉप्टर को घुमाकर वापस लौटा दिया गया। चालक समेत सभी कलाकार सुरक्षित लौट गए लेकिन भयानक काले दैत्याकार पक्षी को देखने के बाद से सभी भयग्रस्त है। इस पक्षी की वास्तविकता का पता लगाने के लिए पाँच व्यक्तियों की एक टीम विन्ध्य घाटी की ओर भेजी गयी जिसमें तीन प्रसिद्ध शिकारी, एक अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के ख्याति लब्ध बर्ड
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एक मरे हुए गाँव की कहानी

जीवन के आखिरी चरण से गुजर रहे वयोवृद्ध कृषि वैज्ञानिक डॉ. जार्ज मैक्सवेल थके मांदे सोफे पर पड़े हुए थे। इस वृद्ध वैज्ञानिक के चेहरे पर की गहरी लकीरे बता रही थी कि कोई बड़ी चिन्ता इस व्यक्ति को सता रही है। डॉ. मैक्सवेल मन ही मन किसी निर्णय पर पहुँच चुके थे, लगता था कि वह द्वन्द्व जो वर्षों से उनके मन-मस्तिष्क को मथता रहा है, शायद आज खत्म हो जायेगा।

निर्णय यही था कि आज डॉ. मैक्सवेल को अपने अतीत के कुछ पन्नों को खोलकर अपने एकमात्र पुत्र जार्ज नेविल के सामने रखना है। डॉ. जार्ज नेविल भी एक उदीयमान कृषि वैज्ञानिक हैं जिन्होंने कम उम्र में ही अपने महत्वपूर्ण रिसर्च पेपर्स के कारण कृषि विज्ञान के क्षेत्र में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा लिया है। पुत्र नेविल की प्रतिभा को निखारने में डॉ. मैक्सवेल की तपस्या का योगदान है। डॉ. नेविल अभी तक एग्रोफार्म के रिसर्च लैब से लौटे नहीं थे।

मैक्सवेल परिश्रमपूर्वक सोफे से उठे और किचेन से एक कप कॉफी लेकर लौटे। कॉफी पीते हुए मैक्सवेल अपने अतीत की पूरी कथा का सार संक्षेप सोचने में व्यस्त थे और नेविल के सामने उसके प्रस्तुतीकरण की प्रक्रिया के बारे में सोच-विचार कर रहे थे। उन्हें यह समझ में नहीं आ रहा था कि उनकी कथा सुनकर नेविल की क्या प्रतिक्रिया होगी। नेविल जो आजतक अपने पिता मैक्सवेल को ही अपना रोल मॉडल मानता आया था, एकबारगी व्यथित नहीं हो जायेगा ?
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दुःस्वप्न

इस एक बड़ी घटना ने आज तक के कई रहस्यलोकों पर से एक साथ पर्दा हटा डाला। मानवलाकुरूची (तमिलनाडु) के समुद्र तटीय क्षेत्र में एक ऐसा यान खड़ा पाया गया जो किसी चमकदार धातु का बना हुआ लगता था । यह अंडाकार था। तीन छड़नुमा पैरों के बल यह तटीय रेत पर खड़ा था। बहुत पहले इसी जगह पर इसे एक बार और देखा गया था लेकिन इसके बारे में कोई जानकारी प्राप्त नहीं हो सकी थी और इसे ‘यू एफ ओ’ की सूची में अंकित कर लिया गया था।

लेकिन इस बार इसके देखे जाने के बाद लोगों को सूचित करते ही भारतीय वैज्ञानिक सक्रिय हो गए थे और एयरक्राफ्ट रिसर्च स्टेशन के एसिस्टेन्ट डायरेक्टर और प्रख्यात भारतीय स्पेस वैज्ञानिक डॉ. सत्यनारायणम् ने अपने नए आविष्कार “एयर जैमर (तीव्र किरणों के नेटवर्क द्वारा यानों के उड़ान को बाधित करनेवाला मैकेनिज्म)” का पहला सफल प्रयोग इसी यान पर कर डाला।

फलतः यह अंडाकार यान उडने में असफल रहा और तब जाकर इसके अंदर बैठी आकृतियों ने पृथ्वी पर संवाद प्रेषण शुरू किया। आश्चर्य यह था कि सारे संवाद या तो अंग्रेजी में या हिन्दी में आ रहे थे। तट के समीप पहुँच चुके स्पेस रिसर्च के वैज्ञानिकों और उड़ान विज्ञानियों ने यह स्पष्ट कर डाला था कि यह यान धरती के किसी देश का निर्मित यान नहीं है।

धरती पर किसी यू.एपफ.ओ. का पकड़ा जाना बड़ी घटना थी। यह यान विचित्र तो था ही सबसे भयानक बात थी कि इसके चारों ओर कुछ दूरी तक का तापक्रम इतना अधिक पाया जा रहा था कि यान तक किसी की पहुंच असंभव थी। यान तक जाने का प्रयास आत्मघाती होता, जल कर नष्ट हो जाने की पूरी संभावना थी। लोग तट से काफी दूर खड़े तमाशा देख रहे थे।
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